तेनालीराम के चतुराई के किस्से “Tenali raman biography & kahaniya in hindi”

Biography of tenali raman in hindi 

हेलो दोस्तों कैसे हैं आप सभी,दोस्तों आज की हमारी पोस्ट तेनालीराम की कहानियां प्राचीन काल की उन कहानियों में से हैं जिनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है,तेनालीराम बीरबल के समान एक बुद्धिमान व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी बुद्धि का प्रदर्शन अपने राज्य और राजा की मदद की.

तेनालीराम जी का जन्म 16वी सदी में हुआ था,ये आंध्र प्रदेश में स्थित एक नगऱ के रहने वाले थे,ये ब्राह्मण परिवार से थे इनको शुरू से ही उचित शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला लेकिन उन्होंने अपनी बुद्धि का उपयोग करके दुनिया में एक बहुत बड़ी पहचान बनाई,तेनालीराम जी भगवत मेला मंडली के लिए कविता गाया करते थे.

एक समय की बात है तेनालीराम भगवत मेला मंडली के साथ विजयनगर में गए हुए थे तभी विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय ने उनको देखा तो उनसे बहुत ही प्रभावित हुए और उन्होंने तेनालीराम को अपने राज्य में एक हास्य कवि के रूप में नियुक्त किया फिर तेनालीराम ने अपनी बुद्धि का उपयोग करके राजा और अपने राज्य में एक पहचान भी बनाई चलिए पढ़ते हैं तेनालीराम की कुछ बेहतरीन कहानियों को 

Tenali raman ki chaturai ke kisse in hindi   

ब्राह्मण की बुद्धिमत्ता 

दोस्तों एक समय जब तेनालीराम विजय नगर में अपने राजा के साथ हास्य कवि के रूप में नियुक्त थे तभी राजा के दरबार में एक ऐसे ब्राह्मण आए जो अपने आप को बहुत ही बुद्धिमान बताते थे उनका मानना था कि उनसे ज्यादा बुद्धिमान व्यक्ति उनके राज्य में तो क्या पूरी दुनिया में भी कोई नहीं है, उनकी नजर में वह खुद सबसे ज्यादा श्रेष्ठ थे जब वह विजय नगर के राजा कृष्णदेवराय जी के पास पहुंचे तो उस ब्राह्मण ने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया और चुनौती दी किआपके राज्य में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो मेरी बुद्धि का मुकाबला कर सके तब उसकी बुद्धि को देखते हुए विजय नगर में राजा कृष्ण देवराय के दरबार में जितनी भी उनके सहयोगी थे सभी ने उसके सामने नतमस्तक कर लिया.

उसी समय राजा को तेनालीराम की याद आई फिर तेनालीराम और उस ब्राह्मण के बीच अपनी बुद्धिमत्ता को प्रदर्शित करने के लिए 1 दिन डिसाइड किया गया,उस दिन तेनालीराम दरबार में एकदम किसी ऋषि का भेष बनाए आए,उनके हाथ में एक थैला था जिसमें लग रहा था कि किताबें हैं. तेनालीराम के पास वही ब्राह्मण बैठे हुए थे अब उस ब्राह्मण को अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करना था तो तेनालीराम ने उस ब्राह्मण से कहा कि मेरे पास एक किताब है उस किताब का नाम तेनालीराम ने बताया और उस ब्राह्मण से कहा की आप मुझे इस किताब के बारे में कुछ बताइए तब ब्राह्मण उस किताब का नाम सुनते ही एकदम घबरा गया क्योंकि उसने अपनी पूरी जिंदगी में इस किताब का नाम नहीं सुना था.

उसने सोचा क्यों ना मैं कुछ दिनों का समय ले लूं वरना लोग मुझ पर हंसेंगे क्योंकि मुझे इस किताब के बारे में कोई जानकारी नहीं है,उसने राजा से कहा महाराज मैं अपनी बुद्धि का प्रदर्शन कर सकता हूं मुझे इस किताब के बारे में पूरी पूरी जानकारी है ये एक बहुत ही बेहतरीन किताब है लेकिन इसके बारे में वर्णन करने के लिए आप मुझे कुछ और समय दें इससे मैं और भी अच्छी जानकारी लेकर इसके बारे में आप सभी को बता सकूं,साथ में मैं कुछ समय आराम करना चाहता हूं मुझे कुछ दिनों का समय दें ऐसा कहकर वह ब्राह्मण और तेनालीराम राज दरबार से चले गए कुछ दिनों बाद जिस तारीख को 
तेनालीराम और उस ब्राह्मण की बुद्धि का प्रदर्शन करने के लिए समय दिया गया था उस तारीख को ब्राह्मण नहीं आया दरअसल वह घबरा कर वहां से चला गया था.

अब 1 दिन महाराज कृष्णदेव राय ने तेनालीराम से पूछा कि आप एक बात बताइए ब्राह्मण पहले तो अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करने के लिए बड़ा ही आतुर हो रहा था लेकिन अब वह पता नहीं कहां पर चला गया ऐसा कैसे तब तेनालीराम ने कहा दरअसल मैंने जो किताब का नाम बताया था वह किताब आज तक इस नाम की दुनिया में कोई है ही नहीं.उस ब्राह्मण ने सोचा इस किताब के बारे में तो मैंने सुना भी नहीं उसने सोचा कि हो सकता है अब मेरा मजाक बन जाए ऐसा सोचते हुए वह राज्य से चला गया इस तरह से तेनालीराम ने अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करके अपने राज्य की इज्जत बचाई और एक घमंडी व्यक्ति को सबक सिखाया.

तेनालीराम की कहानी स्वर्ग की खोज

एक बार विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय अपनी सभा में विराजमान थे तभी उनके दिमाग में एक सवाल आया कि स्वर्ग कितना सुंदर होगा काश मैं स्वर्ग को देख पाता तभी उन्होंने दरबारियों के समक्ष अपने विचारों को प्रकट किया उन्होंने सभी से कहा कि तुम में से कोई स्वर्ग को खोज कर लाओ,मैं वहां पर घूमना चाहता हूं सभी दरबारियों ने काफी कोशिश की लेकिन कोई भी महाराज को नहीं समझा पाया,कोई भी महाराज के सवाल का आंसर नहीं दे पाया तभी तेनालीराम को बुलाया गया महाराज ने वही सवाल तेनालीराम से कहा तो तेनालीराम ने बिना रुके जवाब दिया कि महाराज मैं स्वर्ग की खोज के लिए आपसे सिर्फ 3 महीने चाहता हूं आप मुझे 3 महीने का समय दीजिए और साथ में कुछ सोने की मुद्राएं दीजिए,राजा ने तेनालीराम की बात सुनकर उसे 3 महीने का समय दिया और साथ में कुछ मुद्राएं दे दी और निर्देश दिए कि अगर बिना स्वर्ग खोजें तुम मेरे पास आए तो मैं तुम्हें सजा दूंगा.

3 महीने गुजर चुके थे,एक दिन राजा कृष्ण राय ने तेनालीराम को बुलावा भेजा,तेनालीराम दरबार में आए और राजा ने कहां की क्या तुम्हारी स्वर्ग की खोज पूरी हो चुकी है,तेनालीराम ने कहा कि हां महाराज,आप कल सुबह मेरे साथ स्वर्ग में चलिए तब सुबह तेनालीराम राजा और उनके कुछ दरबारी उनके साथ में स्वर्ग देखने के लिए चल दिए,तेनालीराम उन सभी लोगों को एक ऐसी बेहतरीन जगह पर ले गया जहां पर हरियाली ही हरियाली थी,चारों तरफ पशु पक्षी चहचहा रहे थे और चारों तरफ फल फूल खिल रहे थे ऐसा वातावरण देखकर महाराज ने तेनालीराम से उसकी तारीफ की और कहा कितनी सुंदर जगह है लेकिन स्वर्ग कहां है.

तब तेनालीराम ने कहा कि महाराज यही स्वर्ग है महाराज स्वर्ग किसने देखा है इसका कोई सबूत भी नहीं है लेकिन आप धरती पर ही स्वर्ग देख लीजिए कितना बेहतरीन नजारा है,राजा ने कहा कि चलो ठीक है लेकिन मैंने जो कुछ स्वर्ण मुद्राएं दी थी वह किधर कर दी तुमने तब तेनालीराम ने कहा की महाराज मैंने वह स्वर्णमुद्राएं आपके राज्य को इसी तरह से सुसज्जित करने के लिए लगाइ है,आपके राज्य में भी ऐसी स्वर्ग जैसी सुंदरता रहेगी, ऐसा सुनकर राजा बहुत ही खुश हुए और उन्होंने तेनालीराम को पुरस्कार दिया, इस तरह से तेनालीराम ने अपनी बुद्धि का प्रयोग करके महाराज को खुश कर दिया.

रसगुल्ले की जड़

दोस्तों महाराज कृष्णदेव राय के महल में एक व्यापारी अतिथि बनकर आए हुए थे,महाराज और वह खाना खा रहे थे तभी रसोईया व्यापारी के समक्ष खाने के लिए रसगुल्ले प्रस्तुत करता है तभी वह व्यापारी रसोईया से कहता है कि मुझे रसगुल्ले नहीं खाने मुझे बताओ कि रसगुल्ले की जड़ क्या है?इस सवाल का जवाब ना देने पर वह ये सवाल महाराज के समक्ष रखता है तब महाराज इस सवाल का जवाब देने के लिए अपने चतुर कवि तेनालीराम को बुलाते हैं.
तेनालीराम इस सवाल का जवाव देने के लिए महाराज से एक बर्तन,कपडा और एक चाकू लेकर वहां से कल आने का कह कर चल देते हैं.अगली सुबह वह दरबार में उस सवाल का जवाब देने के लिए प्रस्तुत होते हैं और एक बर्तन में कपड़े से ढककर कुछ लाते हैं.सभी दरबारी ये दृश्य देख रहे होते हैं तभी महाराज कहते हैं कि इस प्लेस में क्या है? तब तेनालीराम कपड़ा उठाकर सभी को बताते हैं और कहते हैं कि देखिए यही रसगुल्ले की जड़ है तब उस व्यापारी के पूछने पर तेनालीराम आगे कहते हैं कि हर मीठे पकवान शक्कर से बनते हैं और शक्कर का स्त्रोत गन्ना होता है,यह गन्ने की जड़ है यानी रसगुल्ले की जड़ है.
ऐसा सुनकर दरबार में उपस्थित सभी लोग हंसने लगते हैं इस तरह से तेनालीराम अपनी चतुराई से इस समस्या का हल करके अपने और अपने राज्य की लाज बचा लेते हैं.

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