पंचतंत्र की छोटी कहानियाँ with moral

हेलो दोस्तों कैसे हैं आप सभी,दोस्तों आज हम आपको हमारी पोस्ट में एक नई पंचतंत्र की कहानी आपके सामने प्रस्तुत करने वाले हैं.

पहली कहानी

दोस्तों एक ब्राह्मण जोकि लोगों के घर पर जाकर पूजा पाठ करता था एक दिन वह सेठ जी के यहां पर पूजा पाठ करने के लिए गया तो सेठजी ने उसको भेंट के रूप में एक बकरी दे दी,ब्राह्मण बकरी को पाकर बहुत ही खुश हुआ और बकरी को अपने कंधे पर रखकर वहां से जाने लगा,उसके घर के रास्ते के बीच में एक जंगल पड़ता था उस जंगल में 3 ठग रहते थे जो लोगों को लूट लिया करते थे,जब उन तीनों ने उस भ्राहमन के कंधे पर एक हस्त पुष्ठ बकरी को देखा तो उन्होंने सोचा कि किसी तरह से हम इस ब्राह्मण की बकरी को छीन ले तो बहुत लाभ होगा.

तीनो ने मिलकर विचार विमर्श किया और उस भ्रमण को ठगने की योजना बना ली जब ब्राह्मण उनके करीब आया तो 2 ठग छुप गए और एक ठग निकला उसने उस भ्रहमन से कहा की आप ब्राह्मण होकर इस गधे  को अपने कंधों पर क्यों रखे हुए हैं अब ब्राह्मण कहने लगा तुम्हें दिखता नहीं कि ये गधा नहीं बल्कि बकरी है तब वह ठग बोला कि नहीं नहीं यह तो गधा है ऐसा कहकर वह वहां से चलता बना.तब कुछ देर बाद एक और ठग निकला,उसने उसके भ्र्ह्मन से कहा ब्राह्मण देवता आप अपने कंधे पर इस कुत्ते को रखकर क्यों ले जा रहे हो तब ब्राह्मण ने कहा कि तुमको दिखता नहीं है ये कुत्ता नहीं बल्की बकरी है तब वह व्यक्ति बोला कि सुनो यह तो कुत्ता ही है शायद आपको कम दिखता है ऐसा कहकर वह वहां से चला गया.
कुछ समय बाद वहां तीसरा ठग आया उसने कहा ब्राह्मण जी रुकिए आप अपने
कंधे पर इस बिल्ली को रखकर क्यों ले जा रहे हो आप ब्राह्मण होकर बिल्ली को अपने कंधे पर रखेंगे तो लोग क्या सोचेंगे,लोग कभी भी आपसे पूजा पाठ नहीं करवाएंगे इसको फेंक दीजिए तब ब्राह्मण कहने लगा कि यह तुमको भी नहीं दिखता यह जो मेरे कंधे पर रखी हुई है वह बकरी है,ऐसा कहते हुए उसने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे कंधे पर कोई भूत रखा हो जो तरह तरह के रूप बदल रहा हो.
इस तरह से विचार करते हुए उसने उस बकरी को वहीं पर फेंक दिया और जोर से भागते हुए अपने घर आ गया लेकिन उन तीनों को वह बकरी मिल चुकी थी और भ्रह्मन उन तीनो की बातों में आकर बेवकूफ बन चुका था.

दोस्तों वाकई में अगर जिंदगी में कुछ करना है तो हमको खुद सोचने की जरूरत है हमको दूसरों की नहीं सुनते हुए अपने दिमाग से काम लेने की जरूरत है तभी हम जिंदगी में कुछ अच्छा,कुछ खास कर सकेंगे.

दूसरी कहानी

दोस्तों काफी समय पहले एक राजा के राज्य में बहुत सारे जानवर रहा करते थे इन जानवरों में बंदर घोड़े कबूतर खरगोश और भेड थे.बंदर राजा के पुत्रों को बहुत ही ज्यादा पसंद थे,वोह वन्दरो की शरारते अक्सर देखते रहते थे,इन जानवरों में से भेड़े राजा के रसोई घर में घुस जाती थी और खाना बनाने वाले लोगों को काफी परेशान करती थी.राजा के उन नोकरो के हाथ में जो भी चीज आ जाती थी वह उसको फेंक कर भेड़ो की ओर मारते थे,व्यर्थ के इस रोज रोज के इस झगड़े को देखकर सभी जानवरों में दुख था एक दिन एक बंदर ने सभी बंदरों की सभा बुलाई और सभी से कहा कि हम इस महल को छोड़ कर चलते हैं वरना इस रोज-रोज के चिल्ला चोट से हम भी मारे जाएंगे तब सभी बंदरों ने उस बंदरों के सरदार से पूछा इससे हमारा क्या नुकसान है तो बंदरों के सरदार ने कहा की खाना बनाने वाले लोग रोज-रोज भेड़ो पर कुछ ना कुछ फेंक कर मारते हैं.
हो सकता है एक दिन वह जलती हुई लकड़ी से भी भेड़ो को मारने के लिए दौड़े और हो सकता है उस जलती हुयी लकड़ी से भेड़ो में आग लग जाए तोह भेड तेजी से दोड़ते हुए घोड़ों के पास में आ जाएं और घोड़ों को भी जलती हुई आग से नुकसान हो जाए तोह हमारा ही नुक्सान है क्योकि कहां जाता है कि बंदरों की चर्बी से बनाई हुई दवाई से घोड़ो की ये बीमारी सही हो जाती है,हमारे राजा को घोड़े बहुत ज्यादा पसंद
हैं हो सकता है वह हमारी चर्बी से घोड़ों का इलाज करवाएं और हम व्यर्थ में मारे जाएं,जब बंदरों के सरदार ने कहा तो सभी बंदरों के सरदार पर हंसने लगे और उन्होंने उसकी बात नहीं मानी.
दोस्तों कुछ समय बाद हुआ भी ऐसा कि जब भेड़े रोटी चुराने के लिए रसोई घर में घुसी तो खाना बनाने वाले लोग जलती हुई लकड़ी लेकर उन भेड़ों के पीछे पड़ गए और उन भेड़ो में आग लग गई और जलती हुई आग से घोड़े प्रभावित हुए और उनके इलाज के लिए वेद जी ने सलाह दी की बंदरो की चर्बी से ही इनका इलाज संभव हो सकता है और सारे के सारे बंदरों की चर्बी निकाल दी गई तो दोस्तों कहा गया है की बुजुर्गों की बात मानना चाहिए और साथ में यह भी कहा गया है कि जहां पर झगड़े हो ऐसी जगह पर हमें ज्यादा समय तक नहीं रहना चाहिए.
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